त्वरित्र (accelerators)। Tvritr kya hai रेखीय त्वरित्र की सरंचना (lineor accelerators), कार्यविधि। उपयोग। सीमायें

 


हैलो! मित्रों आज हम त्वरित्र (accelerators) के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। इस परिचर्चा में हम  रेखीय त्वरित्र क्या है?   रेखीय त्वरित्र की सरंचना क्या है?  रेखीय त्वरित्र के उपयोग कौन से है? और इसके दोष के बारे में परिचर्चा करेंगे?

इसके बारे मे जानकारी देने का प्रयत्न करेंगे।

यह विषय कक्षा 10,,12 और स्नातक स्तर और प्रतियोगिता स्तर के लिए उपयोगी साबित होगा। आपकी सहायता हेतु हमने इस विषय को चुना है।

विषयवस्तु— 

1.त्वरित्र(Accelerator)

2.रैखिक त्वरित्र (Linear Accelerator)

3.बनावट(structure)

4. फॉक्सन (focussing)

5.रैखिक त्वरित्र का लाभ(uses)

6.रैखिक त्वरित्र की सीमाएं (limitation)

1.त्वरित्र(Accelerator):-

वे उपकरण जिनके द्वारा परमाणुविय आवेशित कणों (e,p,d आदि) को त्वरित कर उनकी गतिज ऊर्जा में वृद्धि की जा सके गणतंत्र कहलाते हैं।

 कण त्वरित्र का महत्व सर्वप्रथम रदरफोर्ड ने व्यक्त किया था जिनके अनुसार उच्च ऊर्जा के आवेशित कणों की परमाणु के नाभिक से टक्कर कर नाभिक की संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

Note:- इसे समझने के लिए पहले हमे ज्ञात होना चाहिए कि -

आवेश, आवेश के गुण,आवेश का क्वांटीकरण,आवेश का सूत्र

2.रैखिक त्वरित्र (Linear Accelerator)

एक आवेशित कण पर, बार-बार एक विद्युत क्षेत्र लगाकर त्वरित करने का विचार कर, रेडियो आवृत्ति के दोलनी विद्युत क्षेत्र का उपयोग कर एक रैखिक त्वरित्र का निर्माण वाइडरों (Wideroeys तथा लॉरेन्स (Sloan and Lawrence) ने 1931, तथा बीमस तथा स्नोडी (Beams and Snoddy)ने 1928 में किया था। इसमें भारी आयनों (Hg ions) को त्वरित किया जाता था। इसके बाद स्लोर ।

सावन का वग ने 1934 में प्रारम्भिक रैखिक त्वरित्र बनाये। यहाँ हम Sloan and Lawrence के रैखिक त्वरित्र का सिद्धान्त समझा रहे हैं।

1.बनावट(stracture):-

एक रैखिक त्वरित्र में, विभिन्न लम्बाइयों L1 , L2, L3,....की धातु की बेलनाकार अपवाह नलिकाएं होती हैं जिनके मध्य समान अंतराल होता है।ये अपवाह नलिकाएं विकल्प(alternative) से एक आवृति विधुत वोल्टता स्त्रोत से जुड़ी होती है अर्थात् विषम क्रम संख्या वाली अपवाह नलिकाएँ, वोल्टता स्रोत के एक सिरे से और सम क्रम संख्या वाली नलिकाएँ दूसरे सिरे से। इस आवृत्ति विद्युत वोल्टता स्रोत की आवृत्ति f है, अर्थात् इसके द्वारा उत्पन्न आवृत्ति विद्युत क्षेत्र की निर्वात में तरंगदैर्घ्य 2 =c/f है। इस विद्युत स्रोत के कारण जब अपवाह नलिकायें C1,C3,C5 .(विषम संख्या वाली) धनात्मक होती हैं तब अपवाह नलिकायें C2,C4,,C6,...(सम संख्या वाली) ऋणात्मक होती है। अर्ध आवर्तकाल के बाद जब C1,C3,C5..... ऋणात्मक तब C2, C4, C6..... धनात्मक होती है। अपवाह नलिकाओं को लम्बाइयों L1, L2, L3...... का चयन इस प्रकार किया जाता है कि

रेखीय त्वारित्र


 जब धन आयन किन्ही दो इसका उपयोग अपवाह नलिकाओं के बीच के अन्तराल में हों तब पीछे वाली नलिका धनात्मक और आगे वाली नलिका ऋणात्मक हो। इससे धन आयन त्वरित होगा। अपवाह नलिका में विद्युत क्षेत्र शून्य होता है. जिसके कारण, धन आयन, अपवाह नलिका में नियत वेग से, सरल रेखा में गति करेगा। परिवर्ती विद्युत क्षेत्र की आवृत्ति इस प्रकार होनी चाहिये, जब धन आयन किसी भी अपवाह नलिका से बाहर निकले तब वह नलिका धनात्मक और आगे वाली नलिका ऋणात्मक हो जाये अर्थात् यह समय आवृत्ति विद्युत क्षेत्र के आवर्तकाल (T) का आधा होना चाहिये और इस आधे आवर्तकाल में धन आयन एक अपवाह नलिका को पार कर जाये। तब धन आयन, अपवाह नलिकाओं से बाहर आते समय, प्रत्येक बार त्वरित होकर ऊर्जा ग्रहण करेगा। इस प्रकार बार-बार त्वरण से धन आयन की ऊर्जा बढ़ाई जाती है।

मान लो दो क्रमागत नलिकाओं के मध्य अन्तराल में वोल्ट विभवान्तर लगाया गया है। (v'=Vcosθ ), तथा नलिकाओं की लम्बाई इस प्रकार व्यवस्थित की गई है कि जब भी कोई धन आयन(आवेश e , द्रव्यमान m) नलिकासे बाहर आए, विभवंतर का मन V(max) होता है , तब इस क्षेत्रमें अर्थात् नलिकाओं के बीच के अंतर में आयन त्वरित होगा, और प्रत्येक बार eV ऊर्जा ग्रहण कर लेगा।

चित्र में दिखाई गई व्यवस्थात्मक नलिकाओं के लिये, मान लो nवीं नलिका अन्तराल Ln में आयन का वेग Vn है, तब उपरोक्त विवरण के अनुसार, इस नलिका अन्तराल को पार करने में लगा समय, आरोपित प्रत्यावर्ती विभवान्तर के आवर्तकाल का आधा होना चाहिये, अर्थात्

                             T/2= Ln\Vn

क्योंकि प्रत्येक नलिका अन्तराल के लिये आयन की ऊर्जा में वृद्धि eV है, अत: n नलिकायें पार करने पर आयन का वेग इस प्रकार होना चाहिये कि

                    ½mV²n=neV

या

                  Vn =√2neV/m ..................(2)

इसका उपयोग (1) में करने पर, nवीं नलिका का लम्बाई निम्न प्राप्त होती है।

                Ln =T/2√(2neV/2) ....(3)

आरोपित परिवर्ती वोल्टता के कारण दो क्रमागत नलिकाओं के मध्य परिवर्ती विद्युत क्षेत्र उत्पन्न

होता है, जिसकी आवृत्ति

                      f=1/T

होगी और रैखिक त्वरित्र में यह आवृत्ति स्थिर रखी जाती है। अतः सम्बन्ध (3) को निम्न प्रकार भी

लिखा जा सकता है।

                    Ln =1\2f √2neV/m ................(4)

यदि इस आवर्ती के संगत तरंगदैर्घ्य मानकर f=c\ λया T= 1/f= λ/c का उपयोग (3) में करें तो-

                 Ln =1\2f √2neV/m      

अर्थात्

                 Ln ∝ √n

अत: (i) रैखिक त्वरित्र में नलिकाओं की लम्बाई के समानुपाती होनी चाहिये, अर्थात् चित्र

L1: L2 : L3..... Ln = 1:√2: √3:.....: √n

होनी चाहिये।

2.यदि रेखीय त्वारित्र में नलिकाओं की संख्या n और वोल्टता V स्थित रखें, तब इस त्वारित्र की तरंगदेधर्य के समानुपाती होती है अर्थात् जितनी अधिक आवर्ती होगी उतना छोटा त्वारित्र बना सकते है।

              Ln =1/f जहां f आवृति है।

यदि पूरे रैखिक त्वरित्र में N, अपवाह नलिकाएं हों, तब रैखिक त्वरित्र से निर्गत धन आयन की कुल ऊर्जा होगी

                      E= NeV

निर्गत-धन आयनों की कुल ऊर्जा

यदि रैखिक त्वरित्र में कणों (या आयनों) को भेजने से पहले उनकी ऊर्जा K थी, तब n नलिकायें पार करने पर आयन (कण) का वेग इस प्रकार होगा कि

1/2mV²n= neV + K

तथा तब

Vn=√2(neV+K)/m

और

Ln =1\2f √2(neV+K)/m

होना चाहिये। ऐसी व्यवस्था के लिये रैखिक त्वरित्र से निर्गत धना आयन की कुल ऊर्जा होगी,

E = NeV + K

2.फॉक्सन (focussing):-

Focusing


रैखिक त्वरित्र में आयनों (कणों) के पुंज की त्रिज्यीय फोकसन (radial focussing) और कला फोकसन (phase focussing) दोनों हो जाते हैं। त्रिज्यीय फोकसन, दो अपवाह नलिकाओं के मध्य वक्र विद्यत बल रेखाओं के कारण होता है। जब आयन अन्तराल के प्रथम आधे भाग में होता है सब इसकी गति में नली के अक्ष की ओर वृद्धि मान लो ।∆V।  होती है, तथा शायद अन्तराल के द्वितीय आधे भाग में होता है, तब इसकी गति में ऊर्ध्वाधर वृद्धि अक्ष से की ओर मान लो।∆V'।होती है। अब क्योंकि नलिकाओं के इस अन्तराल मध्य आयन (कण) त्वरित होता है, इसीलिये अक्ष के अनुदिश कण का वेग सतत् बढ़ता जायेगा और द्वितीय अर्ध भाग में वेग प्रथम अर्ध भाग से अधिक होगा। इस कारण अक्ष के ऊर्ध्वाधर वेग वृद्धि के लिये, यह माना जा सकता है कि

                        ।∆V'। <।∆V

अर्थात् नलिकाओं के अन्तराल में, आयन (कण) पुंज की अक्ष की ओर फोकसिंग (focussing) हो जाती है।

3. रैखिक त्वरित्र का लाभ:-

 रैखिक त्वरित्र का मुख्य लाभ यह है कि इससे भारी आयनों की एक अच्छी समान्तरकारी और समांगी पुंज प्राप्त किया जा सकता है।

4.रेखिक त्वरित्र की सीमायें :-

रैखिक त्वरित्र की साईज बहुत लम्बी (= 3km) होने के कारण यह कुछ असुविधाजनक त्वरित्र है और तथा इतने लम्बे भाग में निर्वात बनाये रखना भी एक जटिल कार्य है, इस त्वरित्र में कणों या आयनों की धारा अल्पकालिक स्पन्दों के रूप में प्राप्त होती है।

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                       सधन्यवाद...





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