संधारित्र किसे कहते है। संधारित्र का सिद्धांत।संधारित्र के प्रकार।संधारित्र का संयोजन।संधारित्र का उपयोग।
विषयवस्तु -
1.संधारित्र किसे कहते हैं?
2.संधारित्र का सिद्धान्त
3.संधारित के प्रकार
4.संधारित्र का संयोजन
5.संधारित का उपयोग
1.संधारित्र किसे कहते हैं?
वह युक्ति जिसमें चालक के आकार को बिना बदले उसकी धारिता बढ़ायी जा सकती है, संधारित्र कहलाती है।"
किसी चालक को आवेश देने पर यदि उसका विभव V हो जाता है तो उसकी धारिता C=Q/V
जहां C=धारिता
Q=आवेश
V=विभावंतर
स्पष्ट है कि यदि किसी प्रकार आवेश के लिए विभव का मान V से कम हो जाये तो चालक की धारिता C बढ़ जायेगी।इसी विचार से संधारित्र की खोज हुई।
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2.संधारित्र का सिद्धान्त:-
संधारित्र का सिद्धान्त निम्नलिखित तीन पदों में समझा जा सकता है।
(i) माना किसी चालक A को q आवेश देने पर उसका
विभव V हो जाता है तो उसकी
धारिता C=Q/V......... स्मीकरण (1)
2. अब यदि चालक A के पास इसी प्रकार का दूसरा अन आवेशित चालक B लाया जाए तो प्रेरणा द्वारा उसका आवेशन इस प्रकार होगा।
3. अब यदि चालक B को पृथ्वी से संबंधित कर दिया जाए तो उसका समस्त धन आवेश पृथ्वी में चला जाएगा इस नवीन स्थिति में यदि चालक A का विभव V1 हो तो A की धारिता
C'=Q/V'....... समीकरण (2)
समीकरण 1 व 2 से,
C'/C=Q/V'×Q/V =V/V'.................. समीकरण (3)
परंतु V'=एक चालक A के आवेश के कारण विभव +चालक B के आवेश के कारण उत्पन्न विभव
या V'=V-V"
इसी समीकरण से यह स्पष्ट है कि
. V>V' या C'>C
अर्थात जब एक आवेशित चालक के पास दूसरा अन आवेशित एवं पृथ्वी से संबंधित चालक लाया जाता है तो पहले चालक की धारिता बढ़ जाती है यही संधारित्र का सिद्धांत है।
3.संधारित के प्रकार:-
आकृति और व्यवस्था के आधार पर संधारित्र निम्नलिखित प्रकार के होते है –
समान्तर प्लेट संधारित्र
गोलीय संधारित्र
बेलनाकार संधारित्र
4.संधारित्र का संयोजन:-
1.श्रेणी क्रम संयोजन:-
2.समांतरक्रम संयोजन
1.श्रेणी क्रम संयोजन:-
तीन संधारित्र C1, C2 व ,C3 श्रेणी क्रम में बिंदुओं A और B के बीच जोड़े गए हैं। तो संधारित्र की सभी प्लेटों पर समान आवेश होगा जबकि सभी प्लेटों के बीच विभवांतर क्रमशः V1, V2 व V3 होंगे। तोV1 =q/C1
V2 =q/C2
तथा V3 =q/C3
अब बिंदुओं A और B के बीच कुल विभवांतर
V = V1 + V2 + V3
V= q/C1+q/C2+q/C3 – समीं. ①
यदि बिंदुओं A और B के बीच तुल्य धारिता C हो तो
V= q/C – समीं. ②
अब समीं. ① से V का मान समीं. ② में रखने पर-
q/C= q/C1+q/C2+q/C3
q[1/C]= q[1/C1+1/C2+1/C3]
1/C=1/C1+1/C2+1/C3
स्पष्ट है कि तीन या अधिक संधारित्र श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। तो उनकी तुल्य धारिता का व्युत्क्रम, तीनों संधारित्रों की अलग-अलग धारिताओं के व्युत्क्रम के योग के बराबर होता है। श्रेणी क्रम में जुड़े सभी संधारित्र पर आवेश की मात्रा समान होती है।
2.समांतर क्रम संयोजन:-
समांतर क्रम संयोजन में सभी संधारित्रों को एक साथ जोड़ने के लिए उन सभी संधारित्रों की पहली प्लेट को एक बिंदु A से जोड़ देते हैं। तथा सभी संधारित्रों की दूसरी प्लेट को दूसरे बिंदु B से जोड़ देते हैं। और यदि कई संधारित है। तो उन्हें भी इसी क्रम में जोड़ते हैं। तो संधारित्र के इस संयोजन को समांतर क्रम संयोजन कहते हैं। चित्र से स्पष्ट है।
माना तीन संधारित्र C1, C2 व ,C3 समांतर क्रम में बिंदुओं A और B के बीच जोड़े गए हैं। तो संधारित्रों पर विभवांतर समान होगा। जबकि इन पर आवेश क्रमशः q1, q2 व q3 होंगे।
तो q1 = C1V, q2 = C2V तथा q3 = C3V
अतः आवेश के संरक्षण से
q = q1 + q2 + q3
q = C1V + C2V + C3V – समीं. ①
यदि बिंदुओं A और B के बीच तुल्य धारिता C है तो
q= CV – समीं. ②
अब समीं. ① से q का मान समीं. ② में रखने पर
CV = C1V + C2V + C3V
CV = V(C1 + C2 + C3)
C=C1+C2+C3
स्पष्ट है कि तीन या अधिक संधारित्र समांतर क्रम में जुड़े हैं। तो उनकी तुल्य धारिता, तीनों संधारित्रों की अलग-अलग धारिताओं के योग के बराबर होता है। समांतर क्रम में जुड़े सभी संधारित्र पर विभवांतर समान होता है।
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5. संधारित का उपयोग:-
(1) आवेश और ऊर्जा के भंडारण हेतु प्रयोग किया जाता है।
(2) विद्युत फिल्टरो में उपयोग किया जाता है।
(3) पल्स पावर एवं शस्त्र निर्माण में।
(4) इसका सेंटर के रूप में उपयोग किया जाता है।
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