वान डे ग्राफ जनित्र। सिद्धांत। क्रियाविधि।उपयोग। वान डे ग्राफजनित्र की कमियां
हैलो! मित्रों आज हम वान डे ग्राफ जनित्र के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। इस परिचर्चा में हम वान डे ग्राफ जनित्र क्या है? इसका सिद्धांत क्या है? वान डे ग्राफ जनित्र की क्रियाविधि क्या है? और इसके उपयोग और दोष के बारे में परिचर्चा करेंगे?
इसके बारे मे जानकारी देने का प्रयत्न करेंगे !
यह विषय कक्षा 10,12 और स्नातक स्तर व प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु उपयोगी साबित होगा। आपकी सहायता हेतु हमने इस विषय को चुना है।
विषयवस्तु:-
1.वान डे ग्राफ जनित्र का सिद्धांत
2.वान डी ग्राफ जनित्र की संरचना
3.वान डे ग्राफ जनित्र की उपयोग
4.वान डे ग्राफ जनित्र की कमियां
1. वान डे ग्राफ जनित्र का सिद्धांत:-
माना R त्रिज्या का एक बड़ा चालक गोलीय कोश है जिसे Q आवेश दिया गया है। यह समस्त आवेश कोश के पृष्ठ पर समान रूप से वितरित हो जायेगा।
चूंकि गोलाकार चालक अथवा कोश के पृष्ठ पर मौजूद आवेश उसी प्रकार कार्य करता है जैसे कि वह कोश के केन्द्र पर रखा हो।
इसके साथ आवेशित गोलाकार चालक या चालक गोलीय कोश के अन्दर विद्युत् क्षेत्र (E = 0) तो शून्य होता है लेकिन अन्दर प्रत्येक बिन्दु पर विभव उतना ही होता है जितना कि पृष्ठ पर होता है। अत: कोश के अन्दर प्रत्येक बिन्दु पर विभव
=1/4πε०×Q/R
अब यदि r त्रिज्या का एवं +q आवेश युक्त छोटा गोला कोष के केंद्र पर रख दें तो अब बड़े को लेकर पृष्ठ पर विभव
V(R) =1/4πε0×(Q+q)/R
क्योंकि गोले के केंद्र पर प्रभावी आवेश=(Q+q)
या V(R) =1/4πε0[Q/R +q/R]
भीतर वाले छोटे गोले के पृष्ठ पर विभव
V(r) = छोटे गोले के स्वयं के आवेश के कारण विभव + कोश के पृष्ठ पर आवेश के कारण विभव
या V(r) =1/4πε0×q/r +1/4πε0 ×Q/R
या V(r) = 1/4πε0[Q/R+q/r]...............equ..(2)
चूंकि V(r) -V(R)
=> 1/4πε0[Q/R+q/r] -1/4πε0[Q/R+q/R]
=>1/4πε0[Q/R+q/r -Q/R+q/R]
V(r) -V(R) =1/4πε0[q/r-q/R]
V(r) -V(R) =q/4πε0[1/r-1/R]............equ(3)
समीकरण (3)से स्पष्ट है कि
[1/r-1/R] >0
अतः [ V(r) -V(R)] >0
या V(r) > V(R)
स्पष्ट है कि कोश के पृष्ठ पर आवेश Q चाहे जितना हो लेकिन भीतर वाले छोटे गोले का विभव सदैव कोश के विभव से अधिक होगा, अत: यदि दोनों गोलों को संयोजित कर दें तो तुरन्त आवेश का प्रवाह छोटे गोले से बड़े गोले की ओर होगा क्योंकि आवेश का प्रवाह उच्च विभव सेनिम्न विभव की ओर होता है। इस प्रकार यदि किसी प्रकार बड़े गोले के अन्दर छोटे आवेशित गोले को रखने में सफल हो जायें तो बड़े गोले पर आवेश का अम्बार लगा सकते हैं। फलस्वरूप बड़े गोले का विभव तब तक बढ़ता रहेगा जब तक कि वायु का रोधन नहीं टूट जाताहै। इस पर पृथ्वी के सापेक्ष लाखों वोल्ट का विभवान्तर उत्पन्न किया जा सकता है। यही वान डी ग्राफ जनित्र का सिद्धान्त है।
वान डी ग्राफ जनित्र की संरचना:-
वान डे ग्राफ जनित्र में कई मीटर ऊँचा एक विद्युत्रोधी स्तम्भ एक विशाल चालक गोलीय कोश (जिसकी त्रिज्या कई मीटर होती है) को संभाले रखता है। इसमें दो घिरनियाँ लगी होती हैं जिनमें एक घिरनी खोल (कोश) के केन्द्र पर और दूसरी फर्श के पास लगी होती है। इन दोनों घिरनियों से होकर एक विद्युतरोधी पदार्थ (रबड़ अथवा रेशम) का पट्टा गुजरता है। नीचे वाली घिरनी किसी मोटर से चालित रहती है। यह पट्टा निरन्तर एक आवेश स्रोत से लगे ब्रुश द्वारा आवेश लेकर नीचे से ऊपर शीर्ष तक ले जाता रहता है। यहाँ पर कोश से संयोजित ब्रुश इस आवेश को लेकर कोश को पहुँचाता रहता है जो कोश के बाहरी पृष्ठ पर समान रूप से वितरित होता रहता है। इस प्रकार 6 से 8 लाख वोल्ट तक की उच्च वोल्टता का अन्तर पृथ्वी के सापेक्ष बनाऐ रखा जा सकता है।
3.वान डे ग्राफ जनित्र उपयोग:-
1) क्योंकि वान डी ग्राफ जनित्र के द्वारा अति उच्च विभव उत्पन्न किया जाता है। इसलिए इसका उपयोग अति उच्च विभव उत्पन्न करने में क्या जाता है।
(2) वान डी ग्राफ जनित्र का उपयोग धन-आवेश को अति उच्च वेग तक त्वरित करने में किया जाता है। इसके द्वारा प्रोटोन, α- कण आदि को ऊर्जा दी जाती है।
(3) वान डी ग्राफ जनित्र का उपयोग आवेशित कणों को त्वरित करके उनकी ऊर्जा में वृद्धि करने में किया जाता है।
4. वान डे ग्राफ जनित्र की कमियां:-
1. बड़ा होने के कारण यह असुविधाजनक है कि इसे कहीं ले जा नहीं सकते हैं।
2. बहुत आवेश होने के कारण यह बहुत अत्यधिक खतरनाक भी है।
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